
उत्तराखंड में त्रिपुरा के एक छात्र की हत्या सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, यह भारत के सामाजिक विवेक पर लगा एक गहरा घाव है।
यह वही देश है जिसे हर कोने के लोगों ने अपने खून-पसीने से सींचा, फिर भी सवाल उठता है— क्या North-East आज भी “अपना” नहीं माना जाता?
‘Chinky’, ‘Momo’—ये मज़ाक नहीं, ज़हर हैं
हम इसे अक्सर मज़ाक कहकर टाल देते हैं— “अरे यार, मज़ाक ही तो है” लेकिन सच्चाई यह है कि यह मज़ाक नहीं, वर्षों से पनपती नस्लीय नफरत है।
शब्द पहले मारते हैं, फिर हाथ उठते हैं, और अंत में किसी की जान चली जाती है।
North-East: जहाँ नस्लीय हमला नहीं, अपनापन मिलता है
कितने लोग हैं जिन्होंने कभी North-East जाकर देखा है?
एक बार जाइए— आपको आपकी शक्ल पर नहीं टोका जाएगा। आपकी भाषा पर नहीं हँसा जाएगा। आपकी थाली पर सवाल नहीं उठेगा।
लेकिन जब वहां के हमारे भाई-बहन, बच्चे देश के दूसरे हिस्सों में पढ़ने या काम करने आते हैं, तो उन्हें नस्लीय ताने, शक्ल पर हमले और कभी-कभी मौत तक झेलनी पड़ती है।
राजनीति नहीं, आत्ममंथन चाहिए
इस दर्दनाक घटना पर भी राजनीति शुरू हो गई। लेकिन सच यह है कि यह नफरत किसी एक पार्टी की देन नहीं, यह दशकों की सामाजिक विफलता है।

नेतृत्व बदलता रहा, सरकारें आई-गईं, लेकिन मानसिकता जस की तस रही।
एक भारतीय की खुली माफ़ी
मैं, आशीष शर्मा,
इस पूरे घटनाक्रम से आहत हूँ। हाथ जोड़कर North-East के हर भाई, बहन और बच्चे से माफ़ी मांगता हूँ— हम अपने बच्चों को यह नहीं सिखा पाए कि “जन-गण-मन” सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत की जीवित सच्चाई है।
यह हत्या किसकी हार है?
कानून की? समाज की? शिक्षा की? या हमारी चुप्पी की? शायद सबकी।
यह देश सिर्फ नक्शे से नहीं बनता, यह सम्मान, सुरक्षा और अपनापन से बनता है। अगर North-East का बच्चा दिल्ली, देहरादून या मुंबई में सुरक्षित नहीं है, तो हमें खुद से पूछना होगा— क्या हम सच में “एक भारत” हैं?
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